![]() |
महराजगंज जिले के लक्ष्मीपुर क्षेत्र के ग्राम बनरसिंहा कला (देवदह) से जुड़ी है। यह घटना 5-6 अक्टूबर को सामने आई, जब बौद्ध स्तूप देवदह की चहारदीवारी (बाउंड्री वॉल) निर्माण के लिए हो रही खुदाई में मजदूरों को एक प्राचीन खजाना हाथ लगा।
देवदह बौद्ध स्तूप स्थल, बनरसिंहा कला ग्राम पंचायत, लक्ष्मीपुर तहसील, महराजगंज जिला। यह क्षेत्र नेपाल सीमा के निकट है और लगभग 88.8 एकड़ भूमि पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है। खुदाई रविवार (5 अक्टूबर ) को बाउंड्री वॉल के लिए नींव डालने के दौरान हुई।
मजदूर फावड़े से मिट्टी खोद रहे थे, तभी एक मिट्टी के घड़े से टकरा गए। घड़ा सावधानीपूर्वक निकाला गया, जो करीब 36 किलोग्राम वजनी था। जब मजदूरों ने घड़ा खोला, तो अंदर सैकड़ों तांबे के सिक्के भरे मिले। इनकी चमक और आकार देखकर इलाके में सनसनी फैल गई। मजदूरों ने तुरंत स्थानीय लोगों को सूचना दी, जो पुरातत्व विभाग तक पहुंची।
सभी सिक्के तांबे के बने हैं और कुषाण काल (लगभग 30 ईस्वी से 375 ईस्वी) के हैं। ये सिक्के प्राचीन भारतीय मुद्रा प्रणाली के महत्वपूर्ण अवशेष हैं, जो कुषाण साम्राज्य (जिसके प्रमुख शासक कनिष्क थे) की आर्थिक समृद्धि को दर्शाते हैं। सिक्कों पर राजाओं के चित्र, प्रतीक (जैसे हाथी, घोड़ा या देवी-देवता) हो सकते हैं, जो विस्तृत जांच में स्पष्ट होंगे।
कृष्ण मोहन द्विवेदी ने तत्काल मौके पर पहुंचकर घड़ा और सिक्कों को कब्जे में ले लिया। उन्होंने प्रारंभिक जांच की और सिक्कों को राज्य पुरातत्व विभाग के कार्यालय, लखनऊ भेज दिया गया है।
सिक्कों की संख्या, वजन और ऐतिहासिक मूल्य का आकलन किया जा रहा है। कार्बन डेटिंग या अन्य वैज्ञानिक परीक्षण से उनकी प्रामाणिकता और सटीक काल निर्धारित होगा। द्विवेदी ने बताया कि यह खोज क्षेत्र के उत्खनन कार्य को नई दिशा देगी।
खुदाई स्थल को अस्थायी रूप से सील कर दिया गया है। विभाग ने स्थानीय प्रशासन से अतिरिक्त सुरक्षा की मांग की है, ताकि अवैध खुदाई या चोरी न हो।
यह स्थल बौद्ध इतिहास में महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसे भगवान बुद्ध की ननिहाल (माता महाप्रजापति गौतमी का जन्मस्थान) माना जाता है। यहां प्राचीन बौद्ध स्तूप और अवशेष हैं, जो लुम्बिनी (बुद्ध जन्मस्थल) से जुड़े हैं।

